वो शाम उस पल उन चाँद तारो के बीच शहर के शोर से दूर वो शांत सा माहौल, शहर को na, पहली बार इतना खामोश देखा था हमने अंधेरा जो अक्सर डराता है, वो भी उस दिन एक सुकून सा दे रहा था मानो कुछ कह रहा हो, कह रहा हो कि- " कुछ पल थोड़ा और ठहर जाओ अभी तो आये हो"...... . लगता था उस पल जैसे वक़्त थम सा गया हो..दुनियादारी से दूर सारी दिक्कत परेशानियों को भूल बस हम दोनों और हमारी बाते ......, . इसी बीच अपना सर मेरे काँधे पर रखना...हाथो में हाथ लिए बस एक सवाल करना..... कि "साथ रहोगे न हमेशा" और मेरा जवाब "हाँ हु na रहूँगा भी" . कुछ इसी तरह वो लम्हा बीतता और इस दौरान वो अक्सर सो भी जाया करती Disturb ना हो उसे इसलिए मैं भी खामोश हो जाता चेहरे पर आते उसके ज़ुल्फो को आहिस्ते से उसके कान के पीछे सटा देता , फिर अपनी इन आँखों से उस पल को उसी में जीता और मन ही मन ख्याल आता कि... "इससे भी खूबसूरत कुछ है क्या" . शायद उस रोज़ मैंने कुछ खूबसूरत सा महसूस तो किया था पर उस से भी खूबसूरत एहसास आज है.. हाँ, आज मैं फिर आया हूँ पर इस दफा अकेले वो na शायद अपना सवाल खुद ही भ...